कबीरधामछत्तीसगढ़

कवर्धा 218 करोड़ का शोर या प्रशासनिक सच्चाई?कवर्धा शिक्षा विभाग में तथ्य बनाम राजनीति शिक्षकों के वैधानिक देयकों से जुड़ी राशि है न कि किसी व्यक्तिगत आर्थिक हेराफेरी का प्रमाण।

कवर्धा 218 करोड़ का शोर या प्रशासनिक सच्चाई?
कवर्धा शिक्षा विभाग में तथ्य बनाम राजनीति शिक्षकों के वैधानिक देयकों से जुड़ी राशि है न कि किसी व्यक्तिगत आर्थिक हेराफेरी का प्रमाणसंजय जायसवाल


कवर्धा शिक्षा विभाग में इन दिनों 218 करोड़ रुपये की कथित गड़बड़ी को लेकर लगाए जा रहे आरोपों ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। हालांकि, उपलब्ध तथ्यों की गहराई से समीक्षा करने पर यह मामला आर्थिक अनियमितता से अधिक प्रशासनिक लापरवाही और अंदरूनी राजनीति का प्रतीक प्रतीत होता है।
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) संजय जायसवाल पर लगाए गए आरोपों के संबंध में यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 2022 से नवंबर 2025 तक संबंधित लिपिक (बाबू) द्वारा आवश्यक दस्तावेजों का न तो समय पर अद्यतन किया गया और न ही वेतनमान, एरियर, मंडे पेमेंट एवं अन्य मदों से संबंधित कागजात व्यवस्थित रूप से तैयार किए गए। जिस राशि को “218 करोड़ की गड़बड़ी” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तविकता में शिक्षकों के वैधानिक देयकों से जुड़ी राशि है, न कि किसी व्यक्तिगत आर्थिक हेराफेरी का प्रमाण।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा सहायक संचालक चंद्राकर को जांच के आदेश दिए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। उल्लेखनीय है कि सहायक संचालक चंद्राकर स्वयं पूर्व में उसी ब्लॉक में BEO के पद पर पदस्थ रह चुके हैं, जिससे जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सूत्रों के अनुसार, BEO संजय जायसवाल द्वारा संबंधित बाबू को हटाने के लिए वीडियो साक्ष्य एवं लिखित पत्रों के माध्यम से कई बार जिला शिक्षा अधिकारी को अवगत कराया गया, किंतु इसके बावजूद संबंधित बाबू को पद से नहीं हटाया गया। यह भी आरोप सामने आए हैं कि जो भी नया कर्मचारी वहां पदस्थ होने का प्रयास करता था, उसे धमकाया जाता था, जिससे कागजी कार्यवाही जानबूझकर लंबित रखी गई।
बिना प्रत्यक्ष दस्तावेजी साक्ष्यों के किसी अधिकारी पर 218 करोड़ जैसे भारी-भरकम आरोप लगाना न केवल प्रशासनिक नैतिकता के विपरीत है, बल्कि यह उस राजनीति की ओर भी संकेत करता है, जिसमें “न मानने वाले” अधिकारियों को निशाना बनाया जाता है। यह स्थिति पूर्व में चर्चित “सात करोड़ चूहे कांड” की भी याद दिलाती है, जहां बाद में जांच प्रक्रिया ही विवादों के घेरे में आ गई थी।
शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप से न केवल अधिकारियों की छवि प्रभावित होती है, बल्कि शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के मन में भी अविश्वास की स्थिति बनती है। आवश्यकता इस बात की है कि निष्पक्ष, पारदर्शी एवं दस्तावेज़-आधारित जांच कर वास्तविक जिम्मेदारी तय की जाए—चाहे वह बाबू स्तर की हो या पूर्व पदस्थ अधिकारियों की।

VIKASH SONI

Founder & Editor

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