
कुकदुर वन क्षेत्र में घायल बायसन की मौत वन विभाग पर उठे सवाल
वन्यजीव संरक्षण के नाम पर जिस वयस्क गौर (बायसन) को विभाग ने शिकारियों के तीरों से सुरक्षित बचाने का दावा किया था, वही अब रहस्यमय हालात में दम तोड़ चुका है। 25 अप्रैल की रात करीब 9:30 बजे उसकी मौत की खबर सामने आते ही मामला बेहद संवेदनशील बन गया है। जिस जानवर के शरीर में तीन तीर धंसे हुए थे और जटिल ऑपरेशन के बाद उसे स्वस्थ बताया गया था, उसे भीषण गर्मी के बीच जंगल में छोड़ने का निर्णय अब कठघरे में है।
पंडरिया (पूर्व) वन क्षेत्र में घायल गौर का उपचार कर उसे “सुरक्षित” घोषित किया गया था। विभाग की ओर से लगातार उसके स्वस्थ होने की जानकारी दी जाती रही, लेकिन अचानक हुई मौत ने इन दावों की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि इलाज पूरी तरह सफल था, तो इतने कम समय में उसकी मृत्यु होना प्रशासनिक चूक की ओर इशारा करता है।वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत गौर को अनुसूची-1 में रखा गया है, जिससे उसे सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त है। इस कानून के तहत शिकार पूरी तरह प्रतिबंधित है और वन्यजीवों को राज्य की संपत्ति माना जाता है। ऐसे में यदि किसी संरक्षित जीव की मृत्यु लापरवाही के कारण होती है, तो यह गंभीर कानूनी मामला बनता है।
सूत्रों के मुताबिक, गौर के पैरों की मांसपेशियों में गहराई तक तीर धंसे हुए थे। ऑपरेशन के बाद ऐसे वन्यजीव को नियंत्रित वातावरण में रखकर लगातार चिकित्सकीय देखरेख जरूरी होती है। बड़े जानवरों में ऑपरेशन के बाद संक्रमण और अन्य जटिलताओं का खतरा बना रहता है।
ऐसे संवेदनशील समय में उसे तेज गर्मी के दौरान खुले जंगल में छोड़ देना सवालों के घेरे में है। यदि पर्याप्त रिकवरी और निगरानी नहीं की गई, तो इसे गंभीर लापरवाही माना जा सकता है।वन विभाग की ओर से लगातार प्रेस नोट जारी कर गौर के स्वस्थ होने की बात कही जा रही थी। लेकिन उसकी अचानक मौत ने इन बयानों की सच्चाई पर संदेह पैदा कर दिया है। यदि वास्तविक स्थिति अलग थी, तो यह जनता को भ्रमित करने जैसा भी माना जा सकता है।
वन्यजीव संरक्षण केवल बचाव तक सीमित नहीं होता, बल्कि पूरी तरह स्वस्थ होने तक देखभाल और निगरानी भी उतनी ही जरूरी हैशिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें जेल भेजा गया, जो उचित कदम था। लेकिन अब जब संरक्षित वन्यजीव की मृत्यु हो चुकी है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच अनिवार्य हो जाती है। यदि कहीं लापरवाही या गलत निर्णय सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
इस मामले में स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच समिति बनाकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट सार्वजनिक करना जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
गौर देश का सबसे बड़ा जंगली गोवंश है और पर्यावरण संतुलन में इसकी अहम भूमिका है। जैव विविधता से समृद्ध छत्तीसगढ़ में इस तरह की घटना संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
यह सिर्फ एक जानवर की मौत नहीं, बल्कि पूरे संरक्षण तंत्र की परीक्षा है। कानून की सख्ती तभी प्रभावी होगी, जब जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी।



