
संस्कृति, आस्था और स्वाभिमान की घर वापसी : वनांचल क्षेत्रों में लौट रही मूल सांस्कृतिक चेतना।
पंडरिया विधानसभा क्षेत्र के वनांचल ग्राम बूचीपारा में आयोजित संस्कृति गौरव सम्मेलन एवं अभिनंदन समारोह में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज की सहभागिता देखने को मिली। कार्यक्रम के दौरान पास्टर सहित ग्राम छिरहा, पीपरहा, कुल्हीडोंगरी, जामुनपानी, नागाडबरा एवं नवापारा के लगभग 200 आदिवासी भाई-बहनों ने अपनी मूल आस्था एवं परंपराओं में पुनः प्रवेश किया। सभी का पारंपरिक विधि-विधान, पैर पखारकर सम्मान एवं आत्मीय स्वागत के साथ अभिनंदन किया गया।

इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि पंडरिया विधानसभा आज विकास कार्यों के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक मूल्यों और आदिवासी स्वाभिमान के संरक्षण के लिए भी प्रदेशभर में एक नई पहचान बना रही है। वनांचल क्षेत्रों में लंबे समय से योजनाबद्ध तरीके से धर्मांतरण के प्रयास किए जाते रहे, जिनके माध्यम से आदिवासी समाज की मूल परंपराओं, लोक आस्था, संस्कृति और सामाजिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास हुआ। किंतु अब समाज तेजी से जागरूक हो रहा है और अपनी जड़ों, परंपराओं तथा पूर्वजों की आस्था की ओर पुनः लौट रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि “घर वापसी” केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक स्वाभिमान का व्यापक जनआंदोलन है। यह आंदोलन छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति, सभ्यता और वनांचल क्षेत्रों की पारंपरिक पहचान को सुरक्षित रखने का संकल्प है। आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति, परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा रहा है। ऐसे में किसी भी प्रकार के प्रलोभन, भ्रम या दबाव के माध्यम से उनकी सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करना समाज और संस्कृति दोनों के लिए चिंताजनक विषय है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि कुछ तत्व अपने निजी स्वार्थों के लिए भोले-भाले आदिवासी भाई-बहनों को गुमराह कर धर्मांतरण जैसे कार्यों में संलग्न हैं, जिससे समाज की एकता और सांस्कृतिक निरंतरता प्रभावित होती है। लेकिन अब समाज स्वयं जागृत होकर अपनी अस्मिता और परंपराओं की रक्षा के लिए आगे आ रहा है। वनांचल क्षेत्रों में सांस्कृतिक जागरण और सामाजिक एकजुटता का यह वातावरण आने वाले समय में और अधिक मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” और सर्वधर्म सम्मान की भावना पर आधारित रही है। किसी भी समाज की पहचान उसकी परंपराओं, लोकमान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से होती है। इसलिए आदिवासी समाज की मूल आस्था, देवी-देवताओं, लोक संस्कारों और पारंपरिक जीवन मूल्यों का संरक्षण आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनसमूह ने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण, सामाजिक समरसता और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का संकल्प लिया। समारोह में भाजपा के पदाधिकारी, कार्यकर्ता, समाज प्रमुख, जिला एवं जनपद सदस्य, जनप्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का वातावरण पारंपरिक आदिवासी संस्कृति, लोकगीतों, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव की भावना से ओतप्रोत रहा। उपस्थित लोगों ने इसे क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।




